अनकहि सी थी जो बातें
लो जुबान पें आ गई,
रात के सन्नाटे में
कोई सुरोंसी छा गई
हाल-ए-दिल करते बयाॅं
लो ऑंख नम ये हो गई,
कह गया बातें, पर
कितनी अनकहि सी रह गई
देखा जो इक ख्वाबसा
लो ये हकिकत बन गई,
रूह मेरे गीतों कि
तुमसें हि हैं बन गई
कबसे थीं जो, आज पूरीं
लो तमन्ना हो गई,
तेरीं सांसो में जो लिपटी
रात ये भी खो गई...
तेरीं सांसो में जो लिपटी
रात ये भी खो गई...
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