Monday, December 24, 2012

पल भर का था मोह...

औरतों पर  होने वाले अत्याचारों की खबरे सुनकर मेरा मन भी सभी लोगों की तरह विचलित हो उठता हैं। उसी विचलित मन की यह एक आवाज़ हैं।यह कविता एक किसम की 'यलगार' हैं ... उन अत्याचारियों के खिलाफ ...


पल भर का था मोह
संभाल न पाया खुदको,
कर गया जो न करना था
न सोचा, न पूंछा दिलको।

 
भूल गया है तू
इंसानियत के पाठ को,
कुचल ही डाली ममता
माँ से तू पाता जो।

कैसे भुला तू के
घर तेरे भी हैं माँ,
भूलकर सारे रिश्ते
भुला अपनी
बहना

कदम बढाए ऐसी ओर
न जाने क्या सोचकर,
नहीं लगता, कुछ होगा सोचा
वरना थम जाते, उसी जगहपर।



            


तेरे जिद के आगे
चली नहीं उस अबला की,

घाव दिए उसे तूने
जिससे
डरी दुनिया सारी।

क्यूँ करे तुझे माफ़
न तेरी वह काबिलियत,
क्या करेगा पछताकर
दिए दुख, तूने अनगिनत।

तेरे इस अँधेरे में
करता हु मैं अब ऐलान,
जंग छिड़ी हैं तुझसे
आ, आ मिलते हैं मैदान।

कभी-कबार लगता हैं डर
सुनकर तेरी आहट,
उसी
डर से मिलती हैं
तुझसे फिर लढने की ताकत।


                 ---Kavi Rahul

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