Saturday, June 24, 2017

बेवजह...

बेवजह सा मैं रहु और
बेवजह सी तुम रहो
बेवजह इस जिंदगी मे
इक वजह कि बात हो...

बेवजह सा सारा आलम
बेवजह सा पल भी हो
बेवजह जब दिन ढले तब
इक वजह कि शाम हो...

बेवजह कुछ मैं कहु और
बेवजह कुछ तुम कहो
बाँतों मे अपनी गुजरती
इक वजह कि रात हो...

बेवजह सी मंजिलों के
बेवजह से ख्वाब हो
मंजिलो कि राहो मे बस
इक वजह का साथ हो...

बेवजह इन धड़कनो मे
बेवजह के गीत हो
गीतों के उन बोलो मे बस
इक वजह कि प्रीत हो...

बेवजह से इस जहाँ मे
बेवजह आना जो हो
चलते-चलते संग तुम्हारे
इक वजह का जीना भी हो...
चलते-चलते संग तुम्हारे
इक वजह का जीना भी हो...