जिंदगी मे पागलपन की
कुछ कमिसी हो गई
अपने इस सन्नाटे कि जैसे
अब आदतसी हो गई...
अपनी कुछ हरकतें अब
बडोंसी हो गई
वह बचकानी बातें अब
अजनबीसी हो गई...
दोस्ती मे भी अब
एक तेहजीबसी आ गई
घंटेभर कि बातों मे
थोडी रुकावटसी आ गई...
ढूंढने आएँगे दोस्त
यह बात पुरानीसी हो गई
खुदमे हि मशघूल होने की
अब फितरतसी हो गई...
तमन्नाएँ बहुत है, पर
वक्त कि कमिसी हो गई
दो पल रुकने कि चाह
अब फिजूलसी हो गई...
खामोश इस दिल को अब
घुटंसी हो गई
भीड मे अकेलेपन की
न जाने क्यों आदतसी हो गई...
भीड मे अकेलेपन की
न जाने क्यों आदतसी हो गई...
जिंदगी मे पागलपन की
कुछ कमिसी हो गई...